*"* *एक भले इंसान ने कहा था*"
*इंसान जीता है , पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंत में मर जाता है. जीता इसलिए है ताकि कमा सके. कमाता इसलिए है ताकि खा सके और खाता इसलिए है ताकि जिंदा रह सके लेकिन फिर भी मर जाता है* *अगर सिर्फ मरने के डर से खाते हो तो अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जाएगी. मरना तो सबको एक दिन है ही*
*समाज के लिए जीयो, जिंदगी का एक उद्देश्य बनाओ. गुलामी की जंजीर मे जकड़े समाज को आजाद कराओ. अपना और अपने बच्चो का भरण पोषण तो एक जानवर भी कर लेता है मेरी नजर में इंसान वही है जो समाज की भी चिंता करे और समाज के लिए कार्य करे.*
*तो आइए हम सब मिल के एक आवाज उठाऐं ।*
🔥 *"क्रंति खड़ू"* एक नाम नहीं एक आन्दोलन है। 🔥 आए उसमे हात मिलाए
*जय माँ माहेश्वरी*
इस पे बात खत्म नही हुई,आप ओर हमारे समाज के बाकी भाईओं को सायद मालूम न होगा कि हम भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम जो 1885 में हुआ था उससे पहले हम खडूरा/खर्रा समाज 1762 मे वही कांटे दार कंगन बनाकर नारी समाज को उपहार दिया था।जो कि नारी समाज पहन कर अपनी इज्जत अबब्रु बचाने के साथ अपनी सुरक्षा करती थी।ओर एक बात बता दूं कि छत्तीस गढ़ ओर झारखंड के बहुत सहर ओडिशा में जो पहले (उत्कल)हुआ करता था उस समय जुडा हुआ था।ओर आप झारखंड और छतीस गढ़ के सभी ओडिशा से अभी जाकर वहां जा बैठे हो।दुःख की बात वही है जो आप सभी सामाजिक बन्धु आज तक नहीं जान पारहे हो।"'खड़ू"" ओडिया भषा अभिधान के है जो कंगन कहलाता है।सभी सामाजिक बंधुओं आप सभी ध्यान दे हमारे समाज जो खर्रा/खडूरा/खोदरा/खरूरा नाम से जाने जाते है असल मे हम सभी "'*खडूरा*"' है।क्यों कि हम ""खड़ू"" बना के बेचने का कारोबार करने के कारण हमसे ""*रा*"'जातीय प्रत्यय जुड़ा हुआ है।जो "'*खडूरा*"'हुए हैं।मगर छत्तीशगढ़ ओर ओडिशा के पस्चिमी भागो में ओर अनेक प्रान्त में "'*ड*"'हर बक्त ""*र*"'उच्चारण होता है जैसे "'*गुड़*"'को हम "'*गुर*"' कहते हैं इस के कारण हम "'*खडूरा*"' के जगह "'*खरुरा*''" या ""*खर्रा*"' के नाम से जाने जाते हैं। ओर आप लोग जान ले वही"'* खड़ू""* *क्रांतिखड़ू* है।मगर दुःख की बात यह है जो कि आप को मालूम नहीं।ओर एक बात बता देना चाहता हूँ कि,वही ""*क्रंतिखड़ू*"'को कैसे हम सब मिल के दुनियाँ को दिखलाना है चिंतन करें।आप सभी तो जानते होंगे इतिहास में सभी स्वाधीनता संग्रामियों की नाम है।मगर खडूरा/खर्रा उस समय "'खड़ू"" बनाकर खुत को प्रशासन बिरोधी बनाकर फाशी ,सूली ओर गोली भी खाई है ।ओर बाकी सामाजिक खडूरा/खर्रा खुत को उनसे बचते हुए छुप छूप के गांव देहात में दिन बिताया है।इतना बड़ा ब काम करने के बबजुत भी हमारा समाज ""*खडूरा/खर्रा""* को *"'भारत इतिहास""* आज तक उस दर्जा नहीं दिया है जो एक स्वाधीनता परिबार या बंश को दिया जाता है। इस लिए हम एक प्रयास जारी किए हैं ।ओर दिल्ली से एक न्यूज पेपर के नाम से ""क्रंति खड़ू""* को दुनियां में दिखलाने के प्रयास कर रहे हैं।
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Ramani sahu
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